डेटा प्रोटेक्शन कानून , 21 डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स ने दी चुनौती

खबर छापने से पहले अनुमति लेनी पड़ी तो न्यूज़ रूम बंद हो जाएगी-याची

यह अखबार की खबर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट और इससे जुड़े नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने से संबंधित है।

मुख्य जानकारी:

• मामला: डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने 21 प्रमुख डिजिटल समाचार प्रकाशकों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
• दलील: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए कोई स्पष्ट छूट नहीं दी गई है। यदि हर खबर छापने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति या पूर्व अनुमति लेना जरूरी हुआ, तो खोजी पत्रकारिता और रोजमर्रा की रिपोर्टिंग करना असंभव हो जाएगा और न्यूजरूम बंद होने की स्थिति आ सकती है।
• सुप्रीम कोर्ट का रुख: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रेस की आजादी और नागरिकों की निजता के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
• अगली सुनवाई: इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने कहा, ‘निर्दोष नागरिकों के भी अधिकार हैं। संतुलन बनाना होगा।’ कोर्ट ने मीडिया संस्थानों से व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग रोकने के उपाय सुझाने को भी कहा। डीएनपीए (डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन) का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता को विशेष छूट नहीं दी गई है। इससे खोजी पत्रकारिता और खबर देने वाले सूत्रों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने कहा, ‘निर्दोष नागरिकों के भी अधिकार हैं। संतुलन बनाना होगा।’ कोर्ट ने मीडिया संस्थानों से व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग रोकने के उपाय सुझाने को भी कहा। डीएनपीए (डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन) का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता को विशेष छूट नहीं दी गई है। इससे खोजी पत्रकारिता और खबर देने वाले सूत्रों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act, 2023) और इससे जुड़े विवादों को मुख्य 5 बिंदुओं में इस प्रकार समझा जा सकता है:

1. डीपीडीपी कानून क्या है?

• डेटा सुरक्षा कानून: यह भारत का पहला व्यापक डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून है, जिसे संसद ने अगस्त 2023 में पारित किया था।
• सहमति अनिवार्य: किसी भी व्यक्ति के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा का उपयोग करने के लिए उसकी स्पष्ट और सूचित सहमति या कोई वैध कानूनी आधार होना आवश्यक है।
• भारी जुर्माना: नियमों का उल्लंघन करने या डेटा सुरक्षा में चूक पर 250 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान है।

2. पत्रकारों को आपत्ति क्यों है?

• विशेष छूट का अभाव: इस कानून में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के लिए कोई विशेष छूट या अपवाद तय नहीं किया गया है।
• काम में बाधा: पत्रकारों का तर्क है कि इससे सार्वजनिक हित की खबरें जुटाने, स्टिंग ऑपरेशन करने, संवेदनशील जानकारी निकालने और अपने सूत्रों (Sources) की पहचान गोपनीय रखने में भारी कानूनी अड़चनें पैदा होंगी।

3. क्या पहले पत्रकारिता को छूट का प्रस्ताव था?

• पुराने मसौदे: वर्ष 2018, 2019 और 2021 के प्रस्तावित डेटा प्रोटेक्शन मसौदों (Drafts) में पत्रकारिता से जुड़े कार्यों के लिए कुछ शर्तों के साथ छूट का प्रावधान रखा गया था।
• हटाया गया प्रावधान: साल 2022 के मसौदे और अंततः 2023 में बने अंतिम अधिनियम से पत्रकारिता वाली इस छूट को हटा दिया गया।

4. आरटीआई (सूचना का अधिकार) पर क्या असर पड़ेगा?

• धारा में बदलाव: डीपीडीपी कानून ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 (1) (जे) में संशोधन किया है।
• गोपनीयता बनाम पारदर्शिता: इस बदलाव के बाद सरकारी अधिकारियों या व्यक्तियों से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी आरटीआई के जरिए मांगना और मुश्किल हो गया है, क्योंकि ‘निजी डेटा की गोपनीयता’ को सार्वजनिक हित पर प्राथमिकता मिल सकती है।

5. डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) का क्या तर्क है?

• सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: DNPA ने इस कानून के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
• प्रेस की स्वतंत्रता पर संकट: उनका कहना है कि बिना किसी पत्रकारिता संबंधी अपवाद के यह कानून स्वतंत्र पत्रकारिता, सूचना के प्रवाह और अभिव्यक्ति की आजादी (संविधान के अनुच्छेद 19) को सीमित करता है।

प्रधान संपादक – डॉ दीपक कुमार लहरे

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